PreetNama
ਸਮਾਜ/Social

मुझे कुछ कहना है ,

मुझे कुछ कहना है ,
तुमसे ……
हमारे बीच ,
हम जैसे बनकर रहने वाले ,
सबकी घृणा के पात्र ।
मानवता के माथे का ,
काला दाग ।
मेरी बात की वजह,
तुम ही हो ।
ये सब भी,
तुम्हें ही कह रही हूँ ।
हां तुम,
तुम ही हो वो आदमी
या जानवर ,
या क्या कहूँ ?
शिकारी , विकारी,
या व्यभिचारी?
श्रेणी क्या है तुम्हारी?
हम तो यूँ ही उलझे थे ,
जात-पात के तानों बानों में ।
और कहीं गुपचुप ,
बन रहा था तुम्हारा अस्तित्व ।
तुम तलाश रहे थे बचपन,
यौवन और मौका ।
कली और फूल का अन्तर,
ये भी तुम नहीं देखते ।
और इन्हें कैसे कुचलना ,
ये भी खूब जानते हो ।
कल ही तो तुमने झुंड में,
एक शिकार किया था ।
शिकार करके कली का ,
क्षत विक्षत किया था ।
अनसुना किया ,
एक पुकार को ।
अनदेखा किया ,
दर्द से कराहती आँखों को ।
शायद तुम मरे हुए और जीवित में,
अन्तर नहीं जानते ।
जानते हो केवल वासना ,
ओ , व्यभिचारी
धिक्कार है कि
तुम इसी समाज में ,
निरन्तर बढते जा रहे हो ।
मानवता , संवेदना
मर रही है ।

Gurpreet kaur
Lec punjabi
Ambala city

9467812870

gurpreet.kaur8780@gmail.com

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